सम्मेलन के 39वें महाधिवेशन में दिया
गया अध्यक्षीय संबोधन

डॉ. अनिल सुलभ

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह 39वाँ महाधिवेशन सम्मेलन की स्थापना के शताब्दी-द्वार को दस्तक दे रहा है।
      १७-१८ मार्च २०१८ को आहूत इस दो दिवसीय महाधिवेशन को संपन्न कर जब हम घर लौटेंगे तो,

पूर्व की क्षितिज पर, सम्मेलन के शताब्दी-वर्ष का प्रज्ज्वल सूर्य उदित हो रहे होंगे, जिसके दिव्य प्रकाश में, हिंदी का संसार और भी प्रदीप्त होगा। अंधकार के सारे पक्ष, दिव्य प्रभा में विलीन होकर सुवासित उषा का    आगे पढें..

इतिहास

कार्य समिति एवं सदस्यगण

उद्देश्य एवं नियमावली

इतिहास

            बींसवीं सदी का आरंभ, भारत के लिये एक नये युग का संकेत लेकर आया था। सदियों से दासता से संत्रस्त भारत की आत्मा, बेड़ियों से मुक्ति के लिये अपना मन-प्राण लगाने को तत्पर हुई थी । अंदर की खलबलाहट अभी सतह पर नही आयी थी, किंतु प्रबुद्ध और जागरुक समाज इसकी दस्तक की अनुभूति कर रहा था । स्वतंत्रता की देवी का आह्वान करने हेतु, उसके पुजारी निखिल भारत में विभिन्न स्थानों पर यज्ञ आरंभ कर चुके थे । उनमे वीरों के उष्ण रक्त और मांस – मज्जे की आहुतियाँ भी दी जाने लगी थी । किंतु इसमें एक बड़ी बाधा थी, संपूर्ण भारतवर्ष में संचार और 'संपर्क की एक भाषा' का न होना । बिद्वानो ने यह समझ लिया था कि जबतक संपूर्ण भारतवर्ष मे संपर्क की एक भाषा नही होगी, स्वतंत्रता संदिग्ध बनी रहेगी । दक्षिण भारत के नागरिक, उत्तर की भाषा समझने में असमर्थ हैं, और उत्तर के लोग दक्षिण की । यही स्थिति पूरब और पश्चिम की भी थी । देश के दूसरे प्रांतों में क्या हो रहा है? कैसे अपनी बात पंहुचाई जाये? कैसे संपूर्ण भारत के स्वतंत्रता के पुजारी एक हों और अपनी – अपनी योजनाओं से एक दूसरे को अवगत करायें, मिलकर कार्य करें, यह अत्यंत दुरुह सिद्ध हो रहा था। ‘संस्कृत’ जो अदास भारत की सार्वजनीन भाषा थी, सिमट कर मात्र धार्मिक उत्सवों और कर्म – कांड की, पौरोहित्य की भाषा भर रह गयी थी । सभी जागरुक भारतीयों को संभवत: पहली बार संस्कृत की कमी इतने व्यापक रुप से खली होगी।

             ऐसे ही जागरुक भारतीयों ने गहन विचार – विमर्श के पश्चात् यह निर्णय किया कि, संपूर्ण भारतवर्ष को एक सूत्र मे जोड़ने के लिए उत्तर भारत के एक वृहत् क्षेत्र में बोली जा रही भाषा ‘हिन्दी’ को राष्ट्र की एक संपर्क – भाषा के रुप में विकसित किया जाये। और, इसके राष्ट्र-व्यापी प्रचार, प्रसार और प्रशिक्षण की सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ सुनिशिचत की जायें। साथ ही स्वतंत्रता-आंदोलन और हिन्दी, दोनों के कार्य साथ – साथ चले।

            सन् 1910 में इसी निमित्त अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई। इस महान कार्य में, महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन आदि राष्ट्र-भक्त हिन्दीसेवी महापुरुषों का विषेश योगदान था। अखिल भारतवर्षीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का, उसकी स्थापना के वर्ष से ही प्रतेक वर्ष अलग-अलग प्रांतों में अधिवेशन आयोजित किया जाता था। स्वाभाविक रुप से गैर-हिन्दी-भाषी प्रदेश, सम्मेलन की उच्च प्राथमिकता मे थे। दक्षिण भारत ने भी इसकी आवश्यकता और महत्व को समझा और पूरी हार्दिकता के साथ न केवल इसका स्वागत किया, बल्कि अनेकश: लोग हिन्दी के प्रचार-प्रसार और उन्नति के कार्य मे सक्रिय योगदान देने लगे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही कतिपय राजनैतिक कारणों से वहाँ हिन्दी के प्रति सदभावना में कमी आयी। यह एक अलग संदर्भ है, जिसपर इस लेख में चर्चा अप्रासंगिक है।

            सन् 1919 में सम्मेलन का 10वाँ अधिवेशन बिहार प्रांत में सुनिश्चित हुआ था। उस समय हिन्दी साहित्य से जुड़े कुछ नौजवानों के मन में यह विचार आया कि प्रदेश में भी प्रांतीय सम्मेलन का गठन किया जाना चाहिये। इनमें प्रमुख थे भगवानपुर (मुजफ्फपुर) के प्रतिष्ठित विद्वान श्रीयुत वासुदेव नारायण के पुत्र श्री रामधारी प्रसाद, जिन्हें सम्मेलन की स्थापना का सूत्रधार भी कहा जा सकता है। इसकी प्रेरणा उन्हें इस सूचना से भी मिली कि, जिस-जिस प्रदेश में साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन हुआ था, वहाँ प्रांतीय सम्मेलन की स्थापना कर ली गयी थी। इन उत्साही नौजवान साहित्यकारों और साहित्य-प्रेमियों को किसी ने ह्तोत्साहित किया तो किसी ने प्रोत्साहित भी। प्रतिबद्ध नौजवानों ने इस सिलसिले में राजेन्द्र बाबू (भारत के प्रथम राष्ट्रपति देश रत्न डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद) से भी पत्र द्वारा संपर्क साधा । राजेन्द्र बाबू तब तक अखिल भारतवर्षीय साहित्य सम्मेलन से जुड़ चुके थे, और उन्हीं के प्रयास से, मुंबई में महामना पंडित मदनमोहन मालवीयजी के सभापतित्व में संपन्न हुए 9वें अधिवेशन में स्वीकृति प्राप्त कर, बिहार में सम्मेलन का 10वाँ अधिवेशन आयोजित किया गया था। अधिवेशन की तैयारी तथा स्वागत-समिति के गठन के कार्य हेतु, राजेन्द्र बाबू ने बेतिया से श्री पीर मुहम्मद मूनिस को पटना बुलाया था। पटना से लौटने के क्रम में श्री मूनिस, वासुदेव बाबू से मिलने आए थे। यहीं चर्चा के क्रम में श्री प्रसाद ने प्रांतीय सम्मेलन के गठन का प्रस्ताव रखा था। यह बात दोनों उदारात्माओं को पसंद आयी। और उन्होंने इसकी स्वीकृति प्रदान कर दी। इस कार्य नेक में दूसरे उत्साही नौजवान, जो श्री प्रसाद के मित्र भी थे और प्रतिभावन कवि भी, श्री राघव प्रसाद सिंह, बहुत सहायक सिद्ध हुए। राजेन्द्र बाबू ने नौजवानों का उत्साहवर्द्धन किया और इस हेतु उन्हें आगे बढने को प्रेरित किया। इस कार्य में जी0 बी0 बी0 कॉलेज के हिन्दी अध्यापक श्रीयुत लक्ष्मीनारायण सिंह, बी0 बी0 कॉलेजियेट स्कूल के अध्यापक श्री मथुराप्रसाद दीक्षीत, म्युनिसिपैलिटि के तत्कालीन चेयरमैन बाबू वैद्यनाथ प्रसाद सिंह (स्थापना के सभी कार्य-भार इन्होंने ही उठाया था), अधिवक्ता बाबू लक्ष्मीनारायण, पीर मुहम्मद मूनिस, लतीफ हुसैन नटवर तथा पंडित दर्शन केशरी पाण्डेय जी की उल्लेखनीय भूमिका थी। इन सब के अथक प्रयास के बाद अंतत: मुजफ्फरपुर के हिन्दू भवन के हाते में 19 अक्टूबर 1919 को, श्रीयुत जगन्नाथ प्रसाद एम0 ए0 बी0 एल0 काव्यतीर्थ के सभापतित्व में, हिन्दी सेवियों और हिन्दी प्रेमियों की एक सार्वजनिक सभा हुई, जिसमें बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना का निर्णय की गई। इसी बैठक में यह भी निर्णय किया गया कि सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन, मुजफ्फरपुर जिला की ओर से, सोनपुर मेले के अवसर पर, 8-9 नवम्बर को आयोजित किया जाये। 11 सदस्यों की एक कार्य समिति का भी गठन किया गया, जिसके हिस्से स्वागत समिति का कार्य भी आया। स्वागत समिति के अध्यक्ष बनाये गये श्रीयुत बैधनाथ प्रसाद सिंह और प्रधान मंत्री हुए श्री मथुराप्रसाद दीक्षित। आगे चलकर फिर अधिवेशन के लिये, मलयपुर (मुँगेर) निवासी और ‘हास्यरसावतार’ के रुप में ख्यात पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी को सभापति बनाया गया था। इस प्रकार बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का स्वरुप प्रकट हुआ। प्रत्येक अधिवेशन में स्थायी समिति (तब की कार्य - समिति) का गठन किया जाता था, जो अगले अधिवेशन तक सम्मेलन का कार्य संचालित करती थी।

            अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन की तर्ज पर, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रत्येक वर्ष अलग-अलग जिलों में अधिवेशन होने लगे, जिनमें प्रदेश के सभी नामचीन साहित्यकारों एवं साहित्य – प्रेमियों की उपस्थिति होती थी, जिनमें राजेन्द्र बाबू (भारत के प्रथम राष्ट्रपति), बिहार के प्रथम प्रधान मंत्री / मुख्यमंत्री डॉ0 श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, प्रथम शिक्षा मंत्री और यशस्वी पत्रकार आचार्य बदरी प्रसाद वर्मा, आचार्य शिवपूजन सहाय, आचार्य रामवृक्ष बेनीपुरी, प्रो0 मनोरंजन प्रसाद सिंह, बाबू गंगा शरण सिंह, पंडित जनार्दन प्रसाद झा "द्विज" आदि के नाम प्रमुख रुप से शामिल हैं।

             आरंभ में सम्मेलन का कोई कार्यालय नही था। कोई मंत्री, जो अपने घर मे स्थान उपलब्ध करा देता था, वहीं सम्मेलन का कार्य चलाया जाता था। सम्मेलन के प्रथम सभापति(स्वागताध्यक्ष) श्रीयुत बैधनाथ प्रसाद सिंह (मुजफ्फरपुर नगरपालिका के तत्कालीन अध्यक्ष) के प्रयत्न और सहयोग से, मई 1921 में मुजफ्फरपुर में एक छोटा-सा मकान किराए पर ले लिया गया, जिसमें कार्यालय चलने लगा। इसी में सम्मेलन का पुस्तकालय भी आरंभ किया गया। बैधनाथ बाबू के प्रयत्न से, नगर की पुरानी संस्था हिन्दी भाषा प्राचारणी सभा, जो मृतप्राय हो गयी थी, कुल पुस्तकें और फर्निचर सम्मेलन को प्राप्त हो गये। और इस प्रकार सम्मेलन की वास्तविक उन्नति का कार्य आरंभ हुआ।

            बिहार हिन्दी साहित्य के स्वरुप में नया और ऐतिहासिक मोड़ तब आया, जब सन् 1936 में पूर्णिया में आयोजित सम्मेलन के त्रयोदश अधिवेशन में प्रसिद्ध विद्वान् और हिन्दी संसार के सुपरिचित साहित्यकार पंडित छविनाथ पाण्डेय सम्मेलन के प्रधानमंत्री बनाये गये। पाण्डेय जी के परामर्श पर, इसी अधिवेशन में सम्मेलन का कार्यालय पटना में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव भी पारित किया गया। ‘सर्चलाइट’ के तत्कालीन यशस्वी संपादक श्री मुरलीमनोहर मिश्र के प्रयत्न से बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री श्री अजीज साहेब ने अपने एक्जिबिशन रोड वाले मकान में एक कमरा दे दिया था। उसी मे सम्मेलन का कार्यालय स्थापित किया गया। प्रदेश मे अंतरिम सरकार बन चुकी थी। डॉ0 श्रीकृष्ण सिंह प्रधान मंत्री थे। तब राज्य-सरकारों के मुख्यमंत्रियों को भी प्रधानमंत्री ही कहा जाता था। मुख्यमंत्री समेत मंत्रिमंडल में अनेक मंत्री ऐसे थे, जो साहित्य सम्मेलन से पूर्व से ही आंतरिक रुप से जुडे हुए थे तथा इसमे पूरी श्रद्धा रखते थे। छविनाथ पाण्डेय जी ने सम्मेलन के लिये भूमि आबंटन हेतु राज्य सरकार के समक्ष प्रस्ताव रखा। यह सबके अनुकूल विचार था। इस दिशा मे कार्य आरंभ हुआ। तत्कालीन अधिकारियों, खास महल के पदाधिकारी पंचानंद सिंह, पटना के मजिस्ट्रेट रायबहादुर विसुन देव नारायण सिंह तथा पटना के आयुक्त के निजी सचिव श्री राम प्रसाद शाही ने भी सहयोग किया और कदमकुआँ में भू-खंड उपलब्ध हुआ। इस भूमि पर भवन निर्मान हेतु, बनैली के उदारमना और साहित्य – संस्कृति – प्रेमी राजा श्री कीर्त्यानंद सिंह के एक मुश्त दस हजार रुपये के सहयोग से कार्य आरंभ हुआ। अन्य महानुभावों के सहयोग से 5 हजार रुपये की राशि भी प्राप्त हुई। सन 1942 के आंदोलन में सक्रिय रहने के कारण पंडित छविनाथ पांडेय गिरफ्तार कर लिये गये। इससे निर्माण कार्य बाधित हुआ। सन् 1946 में बौंसी अधिवेशन में प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मेलन के प्रधान मंत्री चुने गये। उन्होंने इस नेक कार्य को आगे बढाया। इसमे राज्य सरकार की ओर से तीन किश्तों में 72 हजार 5 सौ रुपये की राशि प्राप्त हुई थी। और इस प्रकार सन् 1938 से भवन-निर्माण का आरंभ हुआ कार्य सन् 1951 में पूरा हुआ। इसमें सम्मेलन के पदाधिकारियों और साहित्यकारों ने भी हर प्रकार का सहयोग किया, जिसमें श्रमदान भी सम्मिलित था।

            सम्मेलन से हिन्दी साहित्य के विश्रूत संपादक और साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय और हिन्दी – समालोचना के शलाका – पुरुष आचार्य नलिनविलोचन शर्मा सक्रियता से जुड गये थे। सम्मेलन की शोध – पत्रिका ‘साहित्य’ का प्रकाशन आरंभ हो चुका था, जिसकी ख्याति संपूर्ण भारतवर्ष में फैल चुकी थी। यह साहित्य सम्मेलन का स्वर्णिम काल था। देश के बडे-बडे साहित्यकार, सरस्वती के इस मंदिर में, तीर्थ की भावना के साथ आते थे। मुंशी प्रेमचंद, कालजयी रचना ‘कामायनी’ के रचनाकार जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकार और कविगण अपनी रचनाओं को प्रकाशन के पूर्व, इन आचार्यों से दिखा लेना जरुरी समझते थे। विदुषी महिला और आचार्य शिवपूजन सहाय की दिवंगता धर्मपत्नी श्रीमती बच्चन देवी की स्मृति में, नियमित अंतराल पर ‘बच्चन देवी गोष्ठी’ आयोजित होती थी। उसमें देश भर के विद्वान भाग लेते थे। व्याख्यान होते थे। सम्मेलन के सभी विभाग अपने-अपने कार्य में प्रशंसा अर्जित कर रहे थे। कला और संगीत के प्रशिक्षण के कार्य संचालित होते थे।हिन्दी के अतिरिक्त देश की लोक भाषाओं, विशेषकर दक्षिण की भाषाओं की कक्षाएँ चलाई जाती थीं। यहाँ तक की जर्मन, फ्रेंच, रुसी आदि विदेशी भाषाओं की पढाई भी होने लगी थी। विभिन्न स्थानों पर हिन्दी की पढाई के लिए सम्मेलन से शिक्षक भेजे जाते थे । प्रतियोगिताएँ और परिक्षाएँ आयोजित होती थी। उपाधियाँ प्रदान की जाती थी। वह सबकुछ हो रहा था, किया जा रहा था, जिसके लिए सम्मेलन की स्थापना की गयी थी और जो इसके उदेश्यों में सम्मिलित किया गया था।

             कालांतर में धीरे – धीरे, इसकी स्वर्णिम आभा मंद पडने लगी। भारत और हिन्दी के आकाश में, बीसवीं शताब्दी के आरंभ में उदित सूर्य का अवसान दिखने लगा था। शताब्दी का अंतिम दशक आते-आते इसकी दिव्यता और प्रभा समाप्तप्राय हो गयी। यहाँ वह सब कुछ होने लगा, जिसे साहित्य और मनुष्यता की परिभाषा में, निषिद्ध माना जाता है।

            
             सच्चे और अच्छे साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने पुन: प्रज्ञा की देवी सरस्वती को जगाने के लिये, नयी वेदी बनाकर यज्ञ आरंभ किया है, जिसमें निरंतर समिधा दी जा रही है। हम नये स्वर्णिम इतिहास की नींव पड़ते देख रहे हैं। अब साहित्य – समाज किसी रावण, किसी महिषासुर या किसी भस्मासुर को देवी के अपमान का अवसर नहीं देगा। हम आशावान हैं कि शीघ्र ही वे दिन वापस होंगे, जिसके लिये बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन सम्पूर्ण भारतवर्ष में, तीर्थ – सा आदर पाता था।