सम्मेलन के 39वें महाधिवेशन में दिया
गया अध्यक्षीय संबोधन

डॉ. अनिल सुलभ

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह 39वाँ महाधिवेशन सम्मेलन की स्थापना के शताब्दी-द्वार को दस्तक दे रहा है।
      १७-१८ मार्च २०१८ को आहूत इस दो दिवसीय महाधिवेशन को संपन्न कर जब हम घर लौटेंगे तो,

पूर्व की क्षितिज पर, सम्मेलन के शताब्दी-वर्ष का प्रज्ज्वल सूर्य उदित हो रहे होंगे, जिसके दिव्य प्रकाश में, हिंदी का संसार और भी प्रदीप्त होगा। अंधकार के सारे पक्ष, दिव्य प्रभा में विलीन होकर सुवासित उषा का    आगे पढें..

इतिहास

कार्य समिति एवं सदस्यगण

उद्देश्य एवं नियमावली

अध्यक्षीय उदबोधन

Hindi Sahitya Sammelan, Bihar Patna,Hindi Sahitya Sammelan

डाँ. अनिल सुलभ

            बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह ३९वाँ महाधिवेशन सम्मेलन की स्थापना के शताब्दी-द्वार को दस्तक दे रहा है।
            १७-१८ मार्च २०१८ को आहूत इस दो दिवसीय महाधिवेशन को संपन्न कर जब हम घर लौटेंगे तो, पूर्व की क्षितिज पर, सम्मेलन के शताब्दी-वर्ष का प्रज्ज्वल सूर्य उदित हो रहे होंगे, जिसके दिव्य प्रकाश में, हिंदी का संसार और भी प्रदीप्त होगा। अंधकार के सारे पक्ष, दिव्य प्रभा में विलीन होकर सुवासित उषा का स्वागत करेंगे। सम्मेलन का शताब्दी-वर्ष, हिंदी की दिव्यता को निखिल विश्व में विखेरने का एक सुदीर्घ और महान प्रकाश-स्तम्भ बन कर प्रस्तुत होगा ऐसा मेरा विश्वास है।
          विगत ९९ वर्षों में साहित्य सम्मेलन ने, अनेक पाप-ग्रहों की वक्र दृष्टियों के बाद भी, हिंदी भाषा और साहित्य समेत, भारतीय भाषाओं की उन्नति के लिए जो कुछ भी किया है, वह इतिहास-शेष है। १९ अक्टूबर १९१९ को हुई अपनी स्थापना से लेकर अबतक, सम्मेलन ने हिंदी के समक्ष आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने की चेष्टा की है। भाषा और साहित्य की समृद्धि और उन्नयन के लिए निरंतर सक्रिए इस संस्था ने विशिष्ट और मौलिक कार्य किए हैं। मनीषी साहित्यकारों को उचित सम्मान देने, पुस्तकों के प्रकाशन, नवोदितों की पांडुलिपियों के परिशोधन और मार्ग-दर्शन से लेकर विविध यत्नों से, सम्मेलन ने संपूर्ण बिहार हीं नहीं, अपितु भारतवर्ष के साहित्यसेवियों के बहुविध उत्साह-वर्द्धन और मार्ग-दर्शन के कार्य किए हैं।

सम्मेलन अपना ३९वाँ महाधिवेशन मनाने जा रहा है।

            यदि कतिपय बाधाओं के कारण इसमें व्यतिक्रम नहीं उत्पन्न हुआ होता तो यह ९९वाँ महाधिवेशन होता।

            अपनी स्थापना के अनेक वर्षों तक सम्मेलन ने प्रतिवर्ष अपने अधिवेशन किए। प्रथम वार, १९४२ के 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो' आंदोलन से, देश भर में उत्पन्न हुई अस्थिरता तथा सम्मेलन के अधिकारियों की गिरफ़्तारी के कारण, अधिवेशन के आयोजन में व्यतिक्रम पड़ा। स्वतंत्रता प्राप्ति तक फिर कोई अधिवेशन नही हो सका। स्वतंत्र-भारत में यह महान क्रम पुनः आरंभ हुआ, जो अगले १० वर्षों तक राष्ट्र-व्यापी स्वरूप में आहूत होता रहा। यह बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का स्वर्णिम-काल था। तब सम्मेलन के अध्यक्ष थे, भाषा और आलोचना के शिखर-पुरुष, स्तुत्य साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय। सम्मेलन के साहित्य मंत्री के रूप में उनके सबल सहयोगी थे अद्भुत प्रतिभा के धनी साहित्यालोचक और प्रयोग-धर्मी कवि आचार्य नलिन विलोचन शर्मा। इस युग में, जिसे मैं हिंदी साहित्य सम्मेलन का 'आचार्य शिवपूजन-नलिन युग' मानता हूँ, सम्मेलन ने साहित्य संसार में बिहार की प्रतिष्ठा संपूर्ण भारत-वर्ष में हीं नहीं अपितु निखिल विश्व में बढ़ाई। तब प्रकाशित हो रही सम्मेलन की शोध त्रैमासिकी 'साहित्य' ,जर्मनी, इंगलैड, फ़्रान्स, रूस और अमेरिका समेत अनेक राष्ट्रों के पुस्तकालयों में प्रतिष्ठा-पूर्वक स्थान पा रही थी। आज भी उन पुस्तकालयों में तबके 'साहित्य' के अंक देखे जा सकते हैं।

            'साहित्य' , भारत वर्ष के साहित्यकारों के हृदयों में विशिष्ट स्थान बना चुकी थी। बड़े-बड़े साहित्यकार व साहित्यालोचक उसमें छपने को लालायित रहते थे। उसमें एक पृष्ठ भी छप जाना राष्ट्रीय-प्रतिष्ठा और गौरव की बात हुआ करती थी। 'साहित्य' में छपे निबंध अथवा आलोचना की चर्चा संपूर्ण भारतवर्ष में हुआ करती थी। इन दोनों ही साहित्यिक वटवृक्षों की लेखनी में एक चमत्कारिक सामर्थ्य था। जिन पर वे लेखनियाँ उठ गई, वे धन्य हो जाते थे। अनेक प्रतिभाशाली किंतु अलक्षित साहित्यकार, उन दिव्य-लेखनियों की कृपा पाकर साहित्य-संसार में धूमकेतु की तरह छा गए। महान कथा-शिल्पी फनीश्वर नाथ 'रेणु' इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इसी 'साहित्य' के एक अंक में आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने रेणु जी की पुस्तक 'मैला-आँचल' पर समीक्षा लिखी थी और उसे हिन्दी का सर्व-श्रेष्ठ 'आँचलिक-उपन्यास' की संज्ञा दी थी। फिर क्या था! 'मैला आँचल' और फणीश्वर नाथ रेणु, दोनों हीं, रातो-रात साहित्य-संसार में विशिष्ट हो गए।

            यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि, आचार्य शिव पूजन सहाय ने कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र के अनेक पुस्तकों का परिशोधन किया था। प्रेमचंद्र जी आचार्यजी पर इतनी श्रद्धा रखते थे कि, वे अपनी अपनी पुस्तकों को, प्रकाशन के पूर्व, एक बार आचार्य जी से दिखा लेना आवश्यक समझते थे। यहां तक कि, विश्व-महाकाव्य में परिगणित विश्व-विश्रुत अमर-काव्य 'कामायनी' के महाकवि जयशंकर प्रसाद भी अपनी पांडुलिपियाँ आचार्य जी से दिखा लेना सौभाग्य समझते थे। माना जाता है कि, 'कामायनी' के लिए भी आचार्य जी ने अनेक महत्त्वपूर्ण परामर्श दिए, जिन्हें प्रसाद जी ने स्वीकार किया।

           'शिवपूजन-नलिन युग' के बाद सम्मेलन पाप-ग्रहों की वक्र-दृष्टि से अभिषप्त होने लगा। धीरे-धीरे उसकी कांति धूमिल होने लगी। सरस्वती के इस विशाल मंदिर के स्वर्ण-कलश अपनी दिव्यता खोने लगा। और आगे चलकर एक दौर ऐसा भी आया, जब सम्मेलन-परिसर असाहित्यिक अवांक्षितों की क्रीड़ा-स्थली में परिवर्तित हो गया। यह सम्मेलन का सर्वाधिक अंधकार-पक्ष था।

            किंतु साहित्य-सम्मेलन को अपना मन-प्राण देने वाले और अपने रक्त से सिंचित करने वाले उन महान दिव्यात्माओं की प्रेरणा और ऊर्जा से पुनः संगठित होकर साहित्य सम्मेलन ने अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रतिकार हेतु उद्धत हुआ और बहुविध वलिदानों के पश्चात 'मुक्त' हुआ। तबसे, सीमित-साधनों में भी, पुनः आचार्यों की परंपरा में सम्मेलन निरंतर सक्रिए है और महाधिवेशनों के आयोजन भी नियमित हो रहे हैं। सम्मेलन की पुरानी गरिमा और महिमा वापस करने के संकल्प के साथ, बिहार के साहित्यकार इस यज्ञ में, वलिदानों की समिधा डाल रहे है। वागदेवी प्रसन्नता के लिए जो भी मूल्य लेना चाहती हैं, वह सब कुछ देने के लिए साहित्य-समाज तत्पर है।

        साहित्यकारों के वलिदान व्यर्थ नही जाते। सम्मेलन की प्राचीन महिमा पुनः लौटी है। पूर्व में जिस प्रकार श्रद्धा-भाव से भारतवर्ष के सभी बड़े साहित्यिक-तपस्वी इस सारस्वत-मंदिर में पूजा देने आते थे, उसी भावना से पुनः उनके पदार्पण आरंभ हुए है। विगत चार महाधिवेशनों ने इस विचार की पुष्टि की है। हम इस हेतु विद्वानों के अत्यंत आभारी है। उनके भी, जिन्होंने इस महान-यज्ञ में हमारा उत्साह बढ़ाया और भाँति-भाँति से सहयोग प्रदान किया। सम्मेलन अब दूने उत्साह से अपने कर्तव्यों की पूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा है। 'साहित्य' का, 'सम्मेलन साहित्य' के नाम से (भारत के समाचार-पत्रों के पंजीयक ने यही नाम स्वीकृत किया है), प्रकाशन पुनः आरंभ हो गया है। पुस्तकों के प्रकाशन भी पुनः आरंभ हो गए हैं। सम्मेलन की अपनी 'वेव-साइट' भी बन गई है, जिसे 'biharhindisahityasammelan.org' पर देखा जा सकता है। आगामी १९ अक्टूबर से आरंभ हो रहे 'शताब्दी-वर्ष-समारोह' में, सम्मेलन के सौ वर्षों के इतिहास पर एक संग्रहणीय 'इतिहास' के साथ अब तक के सभी अध्यक्षों के, महाधिवेशनों में दिए गए, अभिभाषणों का संग्रह के भी प्रकाशन की योजना है। आधे-घंटे के एक वृत-चल-चित्र का भी निर्माण किया जाना है । किंतु इन सबसे बड़ी और महत्त्वाकांक्षी योजना है- बिहार के सभी साहित्य-सेवियों के परिचय-ग्रंथ का प्रकाशन। अनेक खंडों में प्रकाशित होने वाला यह पुस्तक-माला सम्मेलन के शताब्दी-वर्ष के सुकंठ में श्रद्धापूर्वक डाला जाना है। इस हेतु बिहार के सभी साहित्यकारों से आग्रह किया गया है कि, वे अपना एक पृष्ठ के परिचय और चित्र के साथ अपनी पाँच प्रतिनिधि रचनाएँ यथा शीघ्र सम्मेलन कार्यालय को उपलब्ध करा दें। सम्मेलन की भावना है कि, बिहार का एक भी साहित्य-सेवी छूट न जाए। हम एक बार सभी साहित्यकारों को साहित्य-सागर की विशाल नौका में रख लेना चाहते हैं। दिवंगत साहित्यकारों के संबंध में उनके परिजन या शुभेच्छु सामग्रियाँ उपलब्ध कराने की कृपा करें, ऐसा भी आग्रह किया जा चुका है।

            शताब्दी-वर्ष में, पूरे वर्ष, बिहार के विभिन्न जिलों में, ज़िला-सम्मेलनों के सौजन्य से, विविध आयोजन, जिनमें अधिवेशन भी सम्मिलित है, किए जाएँगे। चेष्टा यह भी होगी कि, दिल्ली समेत देश के अन्य प्रांतों में भी कतिपय उल्लेखनीय उत्सव संपन्न हो, जिसमें संपूर्ण भारत-वर्ष के साहित्यकारों की भागीदारी हो और उन्हें विविध अलंकरणों से विभूषित किया जाए। समय आ गया है, जब हिन्दी विश्व-आंदोलन बन कर प्रकट हो। हमारे पूर्वजों और अग्रजों ने हिंदी भाषा और साहित्य के आंदोलन को, देश की स्वतंत्रता के आंदोलन के समानांतर संपूर्ण भारत वर्ष में चलाया था। विश्व की भाषा बनाने की होड़ में आगे बढ़ चुकी हिंदी के लिए अन्तर्राष्ट्रीय-आंदोलन आज अनिवार्य है। हमारे इस विचार पर, कुछ मित्र और आचार्य यह प्रश्न कर सकते हैं कि, जब हिंदी, भारतवर्ष में हीं राजकीय भाषा नहीं बन पायी है, विश्व की भाषा बनने की होड़ में क्यों? इस प्रश्न का सीधा उत्तर मेरे सामर्थ्य में नहीं है। संभवतः कुछ कालजयी प्रश्नों के उत्तर काल हीं देता है। जिन दिनों ( स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक-काल में), संपूर्ण (अखण्डित) भारतवर्ष की 'संपर्क-भाषा' हिंदी हो, को लेकर आंदोलन आरंभ हुआ था, उन दिनों, भी यह एक यक्ष प्रश्न था कि, "क्या संपूर्ण भारतवर्ष को हिंदी स्वीकार्य होगी?” यह एक ऐतिहासिक सत्य और तथ्य है कि, संपूर्ण भारतवर्ष ने समय की माँग मानते हुए, हिंदी को हृदय से गले लगाया और आंदोलन को शक्ति दी। स्वतंत्रता के अमर वलिदानियों और देश के सभी बड़े नेताओं ने एक स्वर से कहा कि, "हिंदी में पूरे भारत को एक करने और मज़बूती प्रदान करने की अद्भुत क्षमता और सामर्थ्य है"। और इस तरह संपूर्ण राष्ट्र में तिरंगे के साथ हीं 'हिंदी का ध्वज' भी लहरा उठा था। यह दुर्भाग्य है कि, स्वतंत्रता के पश्चात क्षुद्र राजनैतिक कारणों से हिंदी का आंदोलन शिथिल पड़ गया। घोषणा कर के भी भारत का शासन, हिंदी को वह स्थान नही दिया, जो १४ सितम्बर १९४९ को देने का वादा किया था। स्वतंत्रता के पश्चात हमारे पुरोधा अन्यान्य कार्यों में संलिप्त होते चले गए और राष्ट्रीय महत्त्व का यह कार्य पीछे छूट गया। इस कार्य को, और कुछ भी नही, बल्कि एक राजनैतिक निर्णय भर से किया जा सकता है, जो सत्ता के शीर्ष को लेना है।

            दूसरी ओर हमें यह भ्रांति भी मिटानी होगी कि 'हिंदी' भारत की दूसरी लोक-भाषाओं पर लादी जा रही है, या कि, इससे लोक-भाषाओं को किसी प्रकार का संकट है। हम यह मानते है कि भारत की समस्त भाषाएँ हमारी हैं और वो, वह पुण्य-सलीला सरिताएँ हैं, जिनके समागम से हिन्दी रूपी गंगा समृद्ध और व्यापक होती है। किसी भी प्रकार से लोक-भाषाओं पर कोई भी नकारात्मक प्रभाव नहीं होगा, बल्कि देश की एक भाषा, विश्व की महानतम भाषा बनकर समस्त भारतीय नागरिकों को विश्व-समादृत करेगी, गौरव प्रदान करेगी। यह कहना चाहूँगा कि, हिंदी में वे सारे तत्त्व अंतर्निहित हैं, जिनसे वह भारत की हीं नही, विश्व की भाषा बन कर रहेगी। आवश्यकता इस बात की है कि, भारतवर्ष में इसे वही सम्मान मिले, जो सम्मान 'राष्ट्रीय-ध्वज' का है। ज्यों हीं, राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति, भारतीय मन में 'राष्ट्रीय-ध्वज' का सम्मान आ जाएगा, उसके समक्ष की सभी बाधाएँ स्वतः दूर हो जाएँगी। उसी श्रद्धा-भाव और विश्वास के साथ हमें विश्व-आंदोलन भी खड़ा करना है। आज मुझे यह कहने की इच्छा होती है कि, इस महान कार्य में हम सफल होंगे और अपने जीवन में हीं हिंदी को विश्व की श्रेष्ठतम भाषा के स्थान पर प्रतिष्ठित देख कर हीं अपने धरा-धाम के लिए विदा होंगे। प्रस्तुत महाधिवेशन देश की दो महान साहित्यिक विभूतियों;- आचार्यवर्य श्री शिवपूजन सहाय एवं महापंडित राहुल सांकृत्यायन को समर्पित है। 'सम्मेलन-साहित्य' के इस अंक में उन दोनों हीं स्तुत्य विभूतियों पर डिडवानों के सुविस्तृत और सुदीर्घ लेख सम्मिलित किए गए हैं। अतएव उन पर इस आलेख में, कुछ विस्तार से लिखना किंचित उचित नही होगा। वैसे भी आचार्य शिवजी पर मैंने पूर्व में हीं निवेदन कर दिया है। उतने भर से उनके व्यक्तित्व को आँका जा सकता है। राहुल जी मेरे अत्यंत प्रिय और आदर्श लेखक रहे हैं। उनकी पुस्तक 'बोलगा से गंगा' ने मुझे किशोर वय में हीं अभिभूत कर डाला था। वह पाठकों को मुग्ध कर देने वाला अद्भुत उपन्यास है। एक ऐसा उपन्यास, जिसमें मानव-सभ्यता के उद्भव से लेकर बीसवीं सदी की दुनिया का इतिहास भी अनुभव किया जा सकता है। एक उपन्यास में इतनी लम्बी कथा लिखी जा सकती है, यह राहुल जी की प्रतिभा और पांडित्य से हीं संभव है। यह एक चमत्कार के समान है।

             शिवजी और राहुल जी, दोनों ने हीं, राष्ट्र और राष्ट्र-भाषा की अतुल्य सेवा की । दोनों स्वभाव से अलग-अलग थे। एक स्थिर और शांत भाव से एकांतिक-सेवा करने वाले अत्यंत सरल, विनम्र और उदार, तो दूसरे कभी न रुकने वाले, घुमक्कड-यायावर। शिवजी एकांतिक साहित्य-साधना में लीन तो राहुल जी अविराम यात्रा में। एक अबूझ प्यास थी राहुल जी में। एक अद्भुत व्यग्रता थी 'अज्ञात' को 'ज्ञात' करने की। अपनी अंतर की यात्रा के लिए, वे निरंतर बाहर की यात्रा करते रहे। उनके भीतर एक बाबरा अन्वेषक था, जो उन्हें वन-वन भटकाता रहा। इसी यायावरी और अकूँठ जिज्ञासा ने उन्हें ज्ञान की विपुल-संपदा से परिपूरित किया। इसी ने उन्हें बहुत कुछ बनाया। 'हिंदू' से 'बौद्ध' भी और 'महापंडित' भी। उनकी अमर कृतियाँ सदा हिंदी-प्रेमियों का मार्ग-दर्शन करती रहेंगी और संकट के क्षणों में अवसाद-ग्रस्त मन को ऊर्जा प्रदान कर, पुरुषार्थ की प्रेरणा देती रहेंगी। बिहार प्रदेश को हीं नहीं, अपितु संपूर्ण भारत-वर्ष को, इन दोनों महान साहित्यिक विभूतियों पर गर्व है। मेरे लिए यह अत्यंत गौरव की बात है कि, जिस पद ( बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष-पद) को आचार्य जी ने प्रतिष्ठा दी, उस महान आसन पर मुझ अकंचन को भी प्रभु ने प्रतिष्ठित कर दिया। उनके प्रति श्रद्धा-तर्पण देते हुए, मैं इतनी हीं प्रार्थना करना चाहूँगा कि, मुझे वे समस्त दिव्यात्माएँ शक्ति प्रदान करें कि मै अपने विद्वान सहयोगियों और मार्ग-दर्शकों के साथ, उन शेष कार्यों को पूरा कर सकूँ, जिन उद्देश्यों के लिए, आज से ९९वें वर्ष पूर्व, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की गई थी।

             अपने उन समस्त पूर्वजों के दिव्य-चरणों में श्रद्धा के पुष्प समर्पित कर, आप सभी समादृत विद्वानों, सरस्वती-पुत्रों और हिंदी प्रेमियों का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ। आप सभी दिव्यात्माओं की उपस्थिति से हमारा यह महोत्सव और भी दिव्य हुआ है और हमें अशेष ऊर्जा मिली है। मेरा विश्वास है कि, इसी तरह पूर्व की भाँति आप सब इस गौरवमयी संस्था के प्रति सद्भाव बनाए रखेंगे। अपने मूल्यवान सुझावों से हमारा मार्ग-दर्शन करेंगे। मैं, विदुषी साहित्यकार और गोवा की महामहिम राज्यपाल महीयसी डा मृदुला सिन्हा जी का साधुभाव के साथ सविनय अभिनंदन करता हूँ, जिन्होंने सम्मीलन के प्रति सदैव अपना सद्भाव बनाए रखा है और हमारा आग्रह स्वीकार कर हमें कृतार्थ किया है। उनके कर-कमलों से आज न केवल इस ३९वें महाधिवेशन का उद्घाटन हीं हुआ है, बल्कि सम्मेलन का नव-निर्मित और विशाल मुख्य-द्वार का लोकार्पण भी हुआ है, जिसका ऐतिहासिक महत्त्व है। इनकी वाणी हमारे लिए अमृत रही है। इनके विद्वत्तापूर्ण और प्रेम-सिक्त व्याख्यानों से हम सदा लाभान्वित होते रहे है। इनकी कृपापूर्ण उपस्थिति से हमारा गौरव बाधा है। हम इस अधिवेशन के मुख्य अतिथि और मेघालय के महामहिम राज्यपाल श्रीयुत गंगा प्रसाद जी का भी श्रद्धाभाव से अभिनंदन करते है, जिन्होंने हमें सदैव अपना माना है और हमें अपनी गरिमामयी उपस्थिति से प्रतिष्ठा देते रहे हैं। त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल और विद्वान साहित्यकार प्रो सिद्धेश्वर प्रसाद जी के प्रति भी हमारा नमन-भाव निवेदित है, जिनका प्रेम हमें वर्षों से प्राप्त होता आ रहा है और इस महाधिवेशन में भी उनके अत्यंत मूल्यवान समापन-व्याख्यान से हम लाभान्वित हो रहे हैं। गीत के शलाका-पुरुष और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डा सोम ठाकुर, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों के सम्मानित कवि डा सुरेश अवस्थी(कानपुर), विदुषी कवयित्री डा (श्रीमती) कमल मुसद्दी (कानपुर), डा तारा सिंह (मुंबई), गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार की प्राध्यापिका डा सुचित्रा मलिक, असम विश्वविद्यालय सिलचर के प्राध्यापक डा सुरेश चंद्र, दिल्ली दूरदर्शन केंद्र की कार्यक्रम अधिशासी और विदुषी साहित्यकार अर्चना श्रीवास्तव और आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम-प्रबंधक श्री दिलीप कुमार झा के प्रति भी हम सादर अभिनंदन निवेदित करते हैं, जिन्होंने दूर की यात्रा कर इस अधिवेशन को सफल बनाने की कृपा की है।

             अंत में मैं इस आयोजन के स्वागताध्यक्ष और हिंदी प्रेमी, पद्मश्री डा सी पी ठाकुर, माननीय सांसद महोदय के प्रति विशेष आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, जिनके मूल्यवान चेष्टाओं से यह महोत्सव गरिमापूर्ण रूप में संपन्न हो रहा है, तथा जिनकी सांसद-निधि से, सम्मेलन का मुख्य-द्वार उस भव्यता के साथ निर्मित हुआ है, जिसकी परिकल्पना आज से ८ दशक पूर्व, महान कलाचार्य उपेन्द्र महारथी जी ने की थी, जो सम्मेलन भवन के परिकल्पक थे। सम्मेलन की कार्य-समिति और ३९वें महाधिवेशन की स्वागत-समिति का भी अत्यंत आभारी हूँ, जिनकी प्राणापान से की गई अथक सेवा के विना इस महोत्सव को सफल बनाना संभव नही हो सकता था। मैं उन सब मनीषी हिंदी-प्रेमियों के प्रति साधुभाव प्रकट करता हूँ, जिन्होंने अपने सामर्थ्य से बढ़कर, तन,मन और धन से, विना किसी कामना और लालसा के बड़ा सहयोग किया है। हम बिहार के उन सभी पत्रकारों के भी आभारी है, जिन्होंने अपने प्रतिष्ठानों में, हमारे लिए, सदैव प्रेमपूर्ण स्थान बनाया और हमारा उत्साह-वर्द्धन किया है। पुनश्च और बारंबार इस महाधिवेशन के सभी अतिथियों, प्रतिनिधियों और अपनी गरिमामयी उपस्थिति से, इस महोत्सव को दिव्यता प्रदान करने वाले सभी विद्वानों का साधुभाव के साथ अभिनंदन करता हूँ।

डा. अनिल सुलभ