सम्मेलन के 39वें महाधिवेशन में दिया
गया अध्यक्षीय संबोधन

डॉ. अनिल सुलभ

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह 39वाँ महाधिवेशन सम्मेलन की स्थापना के शताब्दी-द्वार को दस्तक दे रहा है।
      १७-१८ मार्च २०१८ को आहूत इस दो दिवसीय महाधिवेशन को संपन्न कर जब हम घर लौटेंगे तो,

पूर्व की क्षितिज पर, सम्मेलन के शताब्दी-वर्ष का प्रज्ज्वल सूर्य उदित हो रहे होंगे, जिसके दिव्य प्रकाश में, हिंदी का संसार और भी प्रदीप्त होगा। अंधकार के सारे पक्ष, दिव्य प्रभा में विलीन होकर सुवासित उषा का    आगे पढें..

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1डा अनिल सुलभ ऐ गर्दिशे अय्याम! नूरे-चश्मे-सफ़ा को आने दो, दिल बहुत भारी है मेरी जाने-वफ़ा को आने दो। तेरा तीरे-नीम-कश दिल में धंस कर रह गया, रोक नही तु रास्ता उस दर्दे-दवा को आने दो। ऊफ़ ये तल्खी जमाने की अब सही नही जाती, नामुराद बेशर्म ! परे हट वादे-सबा को आने दो। बेवफ़ा दगाबाजों ने जिना मुहाल था कर दिया, देखो उध्रर, रास्ता दो ! जाने-वफ़ा को आने दो। बहुत सीलन है, बदबू है तेरे बज़्मे सियासत में, खिड़कियां खोलो ! जरा खुली हवा को आने दो। दिले-खाना खराब तु जरा धड़क धीरे से मगर, सुलभके आनेतक मेरी जाने-अदा को आने दो। # डा अनिल सुलभ
2संतोष मधेपुरी यह रचना 2004 की है। प्रयास है। मार्गदर्शन की अपेक्षा है। धन्यवाद। 1 क्या गोलमाल है? आँखे खुली नही, चारों और, जाल ही जाल है, अरे! यह क्या? लाल रुमाल है? लगता है, कुछ अजीब सा ! क्या गोलमाल है? फन फैलाये गगनचुम्बी इमारतें इन्हें है आँख जरुर, है इसलिए गरूर, नही जानता- नीचे पाताल है! क्या गोलमाल है? पैसा,जिसे खर्च करने से पहले, कर सकता है खर्च, आदमी को! कुछ पत्थर तोड़कर, रोता रहता है, हंसी हंसती है, बहार पतझर पर! पता नही क्या? आदमी मरता- साल-दर-साल है क्या गोलमाल है? गर है आग, बारूद बहुत है, रिसते जख्म पर, जरी है नमक, न कोई दीवार, न है फाटक, इसलिए इतना बबाल है, वाकई कुछ गोलमाल है!
3पंङित पंडित शिवदत्त मिश्र शीपुस्तकें 1 कैवल्य ग्राहकदेवता एन इण्ट्रोडक्सन टू कंज्यूमर प्रोटेक्सन बबुआजी स्वामी विवेकानन्द का सत्यान्वेशन राश्ट्रीय स्वंयसेवक संध का यथार्थ सनातन भारत मासिकपत्रिका आदि साहित्य व्यक्ति समाज और मानवता का निर्माण औरसंस्कारित करता हे।
4Avinash kumarमेरा एक सवाल है। ना जाने उसका क्या जवाब है। कभी हाँ तो कभी ना सुनने को ये दिल बेक़रार है। कभी वो तो कभी उसका ख्बाब मुझे बेचैन करता है। अब ये प्यार नहीं तो क्या है। जो मेरा चैन भी ले लेता है। तुम्हारा यु जुल्फे सवारना मेरी धड़कन को और धड़कना अब ये प्यार नहीं तो क्या है। मेरे सपनो में भी तुम्हारा होना। मेरा एक सवाल है। न जाने उसका क्या जवाब है। मेरी ही तरह क्या तुम्हारा दिल भी बेक़रार है। कवि:-अविनाश कुमार